ट्रांसमिशन सिस्टम (Transmission System): इंजन की शक्ति को पहियों तक पहुँचाने का तंत्र

transmission system

भूमिका: ट्रांसमिशन सिस्टम क्या है?

इंजन शक्ति (Power) तो पैदा करता है, लेकिन वह शक्ति सीधे पहियों को नहीं दी जा सकती। कभी हमें चढ़ाई चढ़ने के लिए ज्यादा ताक़त (Torque) चाहिए होती है, तो कभी समतल सड़क पर ज्यादा रफ्तार (Speed)। इंजन की पावर को नियंत्रित करके पहियों तक सही अनुपात में पहुँचाने वाले पूरे तंत्र को ट्रांसमिशन सिस्टम कहते हैं।

इसे ‘ड्राइव ट्रेन’ (Drive Train) भी कहा जाता है।


1. ट्रांसमिशन सिस्टम के मुख्य भाग (Main Components)

एक मानक वाहन (Rear Wheel Drive) में ट्रांसमिशन इन हिस्सों से मिलकर बनता है:

A. क्लच (Clutch)

यह इंजन और गियरबॉक्स के बीच स्थित होता है। इसका काम इंजन की पावर को गियरबॉक्स से जोड़ना (Engage) या तोड़ना (Disengage) है।

  • उपयोग: गियर बदलते समय या गाड़ी रोकते समय इंजन को चालू रखते हुए पहियों को अलग करने के लिए।

B. गियरबॉक्स (Gearbox / Transmission)

इसमें अलग-अलग साइज के गियर्स का सेट होता है।

  • First Gear: अधिक टॉर्क (ताक़त) लेकिन कम स्पीड।
  • Top Gear: अधिक स्पीड लेकिन कम टॉर्क।
  • Reverse Gear: गाड़ी को पीछे चलाने के लिए।

C. प्रोपेलर शाफ्ट (Propeller Shaft)

यह एक लंबी स्टील की रॉड होती है जो गियरबॉक्स से शक्ति को पीछे के एक्सेल (Differential) तक पहुँचाती है। इसमें Universal Joints लगे होते हैं जो ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर शाफ्ट को लचीलापन देते हैं।

D. डिफरेंशियल (Differential)

यह पीछे के एक्सेल के बीच में लगा होता है। इसके दो मुख्य काम हैं:

  1. पावर की दिशा को $90^\circ$ मोड़कर पहियों तक पहुँचाना।
  2. मोड़ काटते समय अंदरूनी और बाहरी पहियों को अलग-अलग गति (Speed) पर घूमने देना।

2. ट्रांसमिशन के प्रकार (Types of Transmission)

  1. Manual Transmission (MT): इसमें ड्राइवर क्लच पैडल दबाकर खुद गियर बदलता है।
  2. Automatic Transmission (AT): इसमें गाड़ी की स्पीड के अनुसार गियर अपने आप बदलते हैं। इसमें क्लच पैडल नहीं होता।
  3. CVT (Continuously Variable Transmission): इसमें गियर्स की जगह बेल्ट और पुली का उपयोग होता है (जैसे एक्टिवा या स्कूटी में)।

3. ट्रांसमिशन की कार्यप्रणाली (How it Works)

  1. इंजन पावर पैदा करता है और फ्लाईव्हील (Flywheel) को घुमाता है।
  2. क्लच उस पावर को पकड़कर गियरबॉक्स तक भेजता है।
  3. ड्राइवर ज़रूरत के हिसाब से गियर चुनता है, जो पावर को कम या ज्यादा करके प्रोपेलर शाफ्ट को देता है।
  4. शाफ्ट घूमते हुए पावर को डिफरेंशियल तक पहुँचाती है।
  5. अंत में एक्सेल शाफ्ट के जरिए पावर पहियों तक पहुँचती है और गाड़ी आगे बढ़ती है।

4. रखरखाव और सावधानियाँ

  • Gear Oil: गियरबॉक्स और डिफरेंशियल में तेल का स्तर हमेशा चेक करें। तेल कम होने पर गियर घिस सकते हैं और आवाज़ करने लगते हैं।
  • Clutch Riding: चलते समय क्लच पर पैर रखने से क्लच प्लेट जल्दी घिस जाती है।
  • U-Joint Lubrication: प्रोपेलर शाफ्ट के जॉइंट्स में समय-समय पर ग्रीस गन से ग्रीसिंग करें।

निष्कर्ष

ट्रांसमिशन सिस्टम इंजन की ‘रॉ पावर’ को उपयोग के लायक बनाता है। इसके बिना इंजन की पूरी ताकत का सही इस्तेमाल नामुमकिन है। एक डीजल मैकेनिक या MMV छात्र के लिए गियर रेश्यो (Gear Ratio) और टॉर्क कन्वर्जन को समझना सबसे बड़ी सफलता है।

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