
भूमिका: इंटरचेंजेबिलिटी (Interchangeability) क्या है?
आधुनिक उद्योगों में, जब हम हजारों की संख्या में एक जैसे पुर्जे (जैसे नट-बोल्ट) बनाते हैं, तो यह जरूरी है कि वे पुर्जे दुनिया के किसी भी कोने में बनी मशीन में फिट हो सकें। इस गुण को इंटरचेंजेबिलिटी कहते हैं। पुर्जों को इस लायक बनाने के लिए हमें लिमिट्स, फिट्स और टॉलरेंस के सिद्धांतों का पालन करना पड़ता है।
1. लिमिट्स (Limits)
कोई भी मशीन या इंसान किसी पुर्जे को बिल्कुल सटीक साइज (जैसे $20.000$ mm) में बार-बार नहीं बना सकता। इसलिए, कारीगर को एक छूट दी जाती है।
- High Limit: वह अधिकतम साइज जो किसी पुर्जे का हो सकता है।
- Low Limit: वह न्यूनतम साइज जो किसी पुर्जे का हो सकता है।
उदाहरण: यदि किसी रॉड का बेसिक साइज $20$ mm है और लिमिट $\pm0.05$ है, तो:
- High Limit = $20.05$ mm
- Low Limit = $19.95$ mm
2. टॉलरेंस (Tolerances)
किसी पुर्जे की अपर लिमिट (High Limit) और लोअर लिमिट (Low Limit) के बीच के अंतर को टॉलरेंस कहते हैं। यह वह ‘त्रुटि’ (Error) है जिसे उत्पादन के दौरान स्वीकार किया जाता है।
$$Tolerances = High Limit – Low Limit$$
- Unilateral Tolerance: जब छूट केवल एक ही तरफ दी जाए (जैसे $20 +0.02$).
- Bilateral Tolerance: जब छूट बेसिक साइज के दोनों तरफ दी जाए (जैसे $20 \pm0.02$).
3. फिट्स (Fits)
जब दो पुर्जे (एक होल और एक शाफ्ट) आपस में जोड़े जाते हैं, तो उनके बीच के ढीलेपन या जकड़न के स्तर को फिट (Fit) कहते हैं।
A. क्लीयरेंस फिट (Clearance Fit)
इसमें शाफ्ट का साइज हमेशा होल (Hole) के साइज से छोटा होता है। इसके कारण पुर्जे आपस में आसानी से घूम सकते हैं।
- उदाहरण: साइकिल का पहिया और उसकी धुरी।
B. इंटरफेरेंस फिट (Interference Fit)
इसमें शाफ्ट का साइज होल के साइज से बड़ा होता है। इन्हें जोड़ने के लिए दबाव (Force) या गर्मी की ज़रूरत होती है। यह एक बहुत ही मज़बूत फिटिंग है।
- उदाहरण: रेलगाड़ी के पहिए और उसकी धुरी।
C. ट्रांजीशन फिट (Transition Fit)
यह क्लीयरेंस और इंटरफेरेंस के बीच की स्थिति है। इसमें पुर्जे न तो बहुत ढीले होते हैं और न ही बहुत टाइट।
- उदाहरण: गियर बॉक्स के पुर्जे।
4. महत्वपूर्ण शब्दावली (Important Terms)
- Hole Basis System: इसमें होल का साइज स्थिर रखा जाता है और फिटिंग प्राप्त करने के लिए शाफ्ट के साइज को बदला जाता है। (यह सबसे ज्यादा प्रचलित है क्योंकि होल का साइज बदलना मुश्किल होता है)।
- Shaft Basis System: इसमें शाफ्ट का साइज स्थिर रखा जाता है और होल के साइज को बदला जाता है।
- Allowance (अलाउंस): होल और शाफ्ट के बीच जानबूझकर रखा गया न्यूनतम अंतर।
5. इंजीनियरिंग में इसका महत्व
- उत्पादन लागत कम करना: बहुत अधिक सटीकता (Zero Tolerance) की कोशिश करने से उत्पादन महंगा हो जाता है। टॉलरेंस देने से काम आसान और सस्ता होता है।
- मरम्मत में आसानी: अगर मशीन का कोई हिस्सा टूट जाए, तो आप बाज़ार से उसी नंबर का पुर्जा लाकर लगा सकते हैं क्योंकि वह स्टैंडर्ड लिमिट्स में बना है।
- गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control): ‘Go’ और ‘No-Go’ गेज की मदद से पुर्जों को जल्दी चेक किया जा सकता है।
निष्कर्ष
बिना लिमिट्स और फिट्स के, आधुनिक ऑटोमोबाइल या एयरोस्पेस इंडस्ट्री का अस्तित्व संभव नहीं है। एक मशीनिस्ट या फिटर को ड्राइंग पढ़ते समय इन संकेतों को समझना आना चाहिए ताकि वह सही ‘क्लीयरेंस’ या ‘इंटरफेरेंस’ सुनिश्चित कर सके।
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