शब्दालंकार (Shabdalamkara)

अलंकार का शाब्दिक अर्थ है आभूषण या गहना। जिस प्रकार आभूषण पहनने से शरीर की शोभा बढ़ती है, उसी प्रकार काव्य में अलंकारों के प्रयोग से काव्य की शोभा, सुंदरता और चमत्कार बढ़ता है।
शब्दालंकार वहाँ होता है जहाँ काव्य में चमत्कार या सुंदरता शब्द के विशेष प्रयोग पर निर्भर करती है। यदि उस शब्द के स्थान पर उसका कोई पर्यायवाची शब्द रख दिया जाए, तो चमत्कार समाप्त हो जाता है।
शब्दालंकार के तीन प्रमुख भेद निम्नलिखित हैं:
1. अनुप्रास अलंकार (Alliteration)
📌 लक्षण
- परिभाषा: जब काव्य में किसी एक ही वर्ण (अक्षर) की आवृत्ति (Repetition) बार–बार हो, तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
- विशेषता: यहाँ वर्णों की समानता देखी जाती है, शब्दों की नहीं।
✨ उदाहरण
- उदाहरण 1: “चारु चँद्र की चँचल चिंतवन, चिंताहरण चाहे”
- स्पष्टीकरण: यहाँ ‘च’ वर्ण की आवृत्ति बार-बार हुई है।
- उदाहरण 2: “तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।”
- स्पष्टीकरण: यहाँ ‘त’ वर्ण की आवृत्ति लगातार हुई है।
2. यमक अलंकार (Homonym)
📌 लक्षण
- परिभाषा: जब काव्य में एक ही शब्द की आवृत्ति दो या दो से अधिक बार हो, और हर बार उसका अर्थ भिन्न हो, तो वहाँ यमक अलंकार होता है।
- विशेषता: शब्द एक ही होता है, लेकिन संदर्भ के अनुसार उसके अर्थ अलग-अलग होते हैं।
✨ उदाहरण
- उदाहरण 1: “कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय।
या खाए बौराए जग, वा पाए बौराय।।”
- स्पष्टीकरण: यहाँ ‘कनक’ शब्द दो बार आया है:
- पहला कनक = सोना (Gold)
- दूसरा कनक = धतूरा (एक नशीला फल)
- दोनों बार अर्थ अलग होने के कारण यह यमक अलंकार है।
- उदाहरण 2: “माला फेरत जुग गया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।।”
- स्पष्टीकरण: यहाँ ‘फेर’ शब्द का अर्थ है ‘चक्कर या घुमाव’ और ‘फेर’ का अर्थ है ‘परिवर्तन’।
3. श्लेष अलंकार (Pun)
📌 लक्षण
- परिभाषा: जब काव्य में एक ही शब्द का प्रयोग एक ही बार हो, लेकिन उस एक शब्द के एक से अधिक अर्थ निकलें, तो वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
- विशेषता: यहाँ शब्द एक बार आता है, लेकिन वाक्य में प्रयुक्त होने पर वह अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग अर्थ देता है।
✨ उदाहरण
- उदाहरण 1: “रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।”
- स्पष्टीकरण: यहाँ ‘पानी’ शब्द का प्रयोग एक ही बार हुआ है, लेकिन इसके तीन अर्थ निकलते हैं:
- मोती के संदर्भ में पानी = चमक (Luster)
- मानुष (मनुष्य) के संदर्भ में पानी = आत्मसम्मान (Self-respect)
- चून (चूना/आटा) के संदर्भ में पानी = जल (Water)
- उदाहरण 2: “चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गम्भीर।
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के वीर।।”
- स्पष्टीकरण: यहाँ दो शब्दों के दो-दो अर्थ हैं:
- वृषभानुजा = (1) वृषभानु की बेटी (राधा), (2) वृषभ + अनुजा (गाय)।
- हलधर = (1) हल धारण करने वाले (बलराम), (2) हल धारण करने वाला (बैल)।
ज़रूर! यहाँ पर अर्थालंकार (Arthalankara) की परिभाषा और उनके प्रमुख भेदों—उपमा, रूपक, और उत्प्रेक्षा—की विस्तृत जानकारी दी गई है।
💎 अर्थालंकार (Arthalankara)
अर्थालंकार वहाँ होता है जहाँ काव्य में चमत्कार या सुंदरता शब्द के अर्थ पर निर्भर करती है। यदि उस शब्द के स्थान पर उसका कोई पर्यायवाची शब्द भी रख दिया जाए, तो भी काव्य का सौंदर्य बना रहता है।
सरल शब्दों में, यह वह अलंकार है जहाँ अर्थ की प्रधानता होती है, न कि शब्दों की।
अर्थालंकार के तीन प्रमुख भेद निम्नलिखित हैं:
1. उपमा अलंकार (Simile)
📌 लक्षण
- परिभाषा: जब काव्य में दो भिन्न वस्तुओं में समानता या तुलना दर्शाई जाती है। यहाँ एक वस्तु (उपमेय) को दूसरी वस्तु (उपमान) के समान बताया जाता है।
- पहचान: इसमें ‘सा’, ‘सी’, ‘से’, ‘सम’, ‘समान’, ‘सरीखा’, ‘तुल्य’ जैसे वाचक शब्द का प्रयोग होता है।
- उपमा के चार अंग:
- उपमेय: जिसकी तुलना की जाए (प्रस्तुत वस्तु)।
- उपमान: जिससे तुलना की जाए (अप्रस्तुत वस्तु)।
- साधारण धर्म: वह गुण जो उपमेय और उपमान दोनों में समान हो।
- वाचक शब्द: तुलना बताने वाला शब्द (‘सा’, ‘सी’, ‘समान’ आदि)।
✨ उदाहरण
- उदाहरण: “पीपर पातसरिसमनडोला।”
- स्पष्टीकरण:
- उपमेय: मन (मन की तुलना हो रही है)
- उपमान: पीपर पात (पीपल के पत्ते से तुलना हो रही है)
- साधारण धर्म: डोला (डोलना/चंचलता – समान गुण)
- वाचक शब्द: सरिस (समान/की तरह)
- स्पष्टीकरण:
2. रूपक अलंकार (Metaphor)
📌 लक्षण
- परिभाषा: जब काव्य में उपमेय (जिसकी तुलना की जा रही है) और उपमान (जिससे तुलना की जा रही है) में अत्यधिक समानता होने के कारण, उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप कर दिया जाता है। यानी, उपमेय को ही उपमान का रूप दे दिया जाता है।
- पहचान: उपमा अलंकार के वाचक शब्दों (‘सा’, ‘सी’, ‘से’) का प्रयोग नहीं होता।
✨ उदाहरण
- उदाहरण: “चरणकमल बंदौ हरिराई।”
- स्पष्टीकरण: यहाँ ‘चरण’ (उपमेय) पर ‘कमल’ (उपमान) का आरोप किया गया है। चरणों को कमल के समान न बताकर, चरणों को ही कमल का रूप दे दिया गया है।
- उदाहरण: “मैया मैं तो चंद्र–खिलौना लैहों।”
- स्पष्टीकरण: बालक कृष्ण चंद्रमा (उपमान) को खिलौना (उपमेय) नहीं, बल्कि चंद्रमा को ही खिलौना मानकर माँग रहे हैं।
3. उत्प्रेक्षा अलंकार (Hypophora / Poetic Fancy)
📌 लक्षण
- परिभाषा: जब काव्य में उपमेय में उपमान की संभावना (Possibility) व्यक्त की जाए। यह कल्पना की जाती है कि उपमेय, उपमान ही है।
- पहचान: इसमें ‘मनु’, ‘मानो’, ‘जनु’, ‘जानो’, ‘मनहु’, ‘जनहु’ जैसे वाचक शब्द का प्रयोग होता है।
✨ उदाहरण
- उदाहरण: “सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात।
मनो नीलमनि सैल पर, आतप परयौ प्रभात।।”
- स्पष्टीकरण: कृष्ण के साँवले शरीर (उपमेय) पर पीले वस्त्र ऐसे लग रहे हैं, मानो (मनो) नीलमणि पर्वत (उपमान) पर सुबह की धूप पड़ रही हो। यहाँ संभावना या कल्पना व्यक्त की गई है।
- उदाहरण: “फूले कास सकल महि छाई।
जनु बरसा कृत प्रकट बुढ़ाई।”
- स्पष्टीकरण: कास के सफेद फूल (उपमेय) ऐसे लग रहे हैं, मानो (जनु) वर्षा ऋतु का बुढ़ापा (उपमान) प्रकट हो गया हो।
शब्दालंकार और अर्थालंकार में मुख्य अंतर
| अंतर का आधार | शब्दालंकार (Shabdalamkara) | अर्थालंकार (Arthalankara) |
| चमत्कार का केंद्र | शब्द या वर्ण (अक्षर) पर आधारित होता है। | अर्थ या भाव पर आधारित होता है। |
| परिवर्तन का प्रभाव | यदि प्रयोग किए गए शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची रख दिया जाए, तो काव्य का सौंदर्य समाप्त हो जाता है। | यदि प्रयोग किए गए शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची रख दिया जाए, तो काव्य का सौंदर्य बना रहता है। |
| प्रधानता | शब्द की प्रधानता होती है। | अर्थ की प्रधानता होती है। |
| उदाहरण (भेद) | अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनरुक्तिप्रकाश। | उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण, सन्देह, भ्रांतिमान। |
| उदाहरण | कनक कनक ते सौ गुनी… (शब्द बदलने पर अर्थ खत्म) | मुख चन्द्रमा सा सुंदर है। (यहां ‘चन्द्रमा’ की जगह ‘शशि’ रखने पर भी सौंदर्य बना रहेगा) |
💡 मुख्य निष्कर्ष
- यदि चमत्कार शब्द की ध्वन्यात्मक विशेषता (रिपीटेशन या शब्दों के खेल) में है, तो वह शब्दालंकार है।
- यदि चमत्कार उपमेय और उपमान के बीच तुलना या समानता दिखाने के कारण अर्थ की गहराई में है, तो वह अर्थालंकार है।
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विकारी शब्द -संज्ञा , सर्वनाम , विशेषण , क्रिया।
अविकारी शब्द -क्रिया विशेषण ,संबंधबोधक,समुच्चयबोधक ,विस्मयादिबोधक,निपात।